रायपुरछत्तीसगढ़

रायपुर में ट्रैफिक का ‘डबल गेम’? आम जनता पर सख्ती, माननीयों को राहत

ड्रिंक एंड ड्राइव में भी ‘शॉर्टकट’ कार्रवाई के आरोप

सरकारी गाड़ियों का एक भी चालान दर्ज नहीं

रायपुर। राजधानी रायपुर में ट्रैफिक पुलिस की कार्रवाई अब बड़े सवालों के घेरे में है। एक तरफ आम लोगों से करोड़ों रुपये के चालान वसूले जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकारी गाड़ियों और प्रभावशाली लोगों को छूट देने के आरोप लग रहे हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि ड्रिंक एंड ड्राइव जैसे मामलों में भी नियमों को दरकिनार कर सीधे कोर्ट भेजने और बिना पुख्ता जांच कार्रवाई करने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

अभियान के नाम पर वसूली का रिकॉर्ड

राजधानी रायपुर में ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने के नाम पर चल रहा अभियान अब विवादों में घिरता जा रहा है। आंकड़े बताते हैं कि जनवरी से मार्च 2026 के बीच ट्रैफिक पुलिस ने 2 लाख 4 हजार से ज्यादा चालान काटे, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा सिर्फ 30 हजार के आसपास था। यानी इस बार करीब साढ़े छह गुना ज्यादा कार्रवाई की गई।
इतना ही नहीं, तीन महीने के भीतर आम लोगों से 5 करोड़ 64 लाख रुपये से ज्यादा जुर्माना वसूला गया, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग दोगुना है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस पूरी कार्रवाई में सरकारी गाड़ियों का एक भी चालान दर्ज नहीं किया गया।

आम आदमी पर सख्ती, ‘साहब’ सुरक्षित?

ट्रैफिक अफसरों का कहना है कि सरकारी गाड़ियों पर चालान नहीं काटा जाता, लेकिन परिवहन विभाग साफ कहता है कि नियम सभी के लिए बराबर हैं। मोटर व्हीकल एक्ट में कहीं भी सरकारी वाहनों को छूट का प्रावधान नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर किन नियमों के तहत सरकारी गाड़ियों को बचाया जा रहा है?
लोगों में यह धारणा तेजी से बन रही है कि ट्रैफिक नियमों का डंडा सिर्फ आम जनता पर ही चलाया जा रहा है, जबकि प्रभावशाली और सरकारी वाहन बेखौफ नियम तोड़ रहे हैं।

ड्रिंक एंड ड्राइव में भी ‘शॉर्टकट’!

सबसे गंभीर आरोप ड्रिंक एंड ड्राइव कार्रवाई को लेकर हैं। वाहन चालकों का कहना है कि कई मामलों में न तो ब्रेथलाइज़र टेस्ट का प्रिंटआउट दिया जा रहा है और न ही मेडिकल जांच कराई जा रही है, फिर भी सीधे कोर्ट भेजा जा रहा है।

कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि केवल शक या मुंह से शराब की गंध के आधार पर चालान काटा जा रहा है। जबकि नियम साफ कहते हैं कि 30mg/100ml से ज्यादा अल्कोहल की पुष्टि के लिए ब्रेथलाइज़र या मेडिकल रिपोर्ट जरूरी है।

मशीन पर भी उठे सवाल

अब जांच में इस्तेमाल हो रही ब्रेथलाइज़र मशीनों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगे हैं। यदि मशीन का नियमित कैलिब्रेशन नहीं हो रहा या रिपोर्ट पारदर्शी तरीके से नहीं दी जा रही, तो पूरी कार्रवाई पर संदेह होना स्वाभाविक है।

कानूनी जानकारों का कहना है कि बिना ठोस साक्ष्य के ऐसे मामलों में कोर्ट में चालान टिकना मुश्किल हो सकता है।

चुनिंदा कार्रवाई से बढ़ा शक


लोगों का आरोप है कि जांच के दौरान सभी वाहनों को नहीं रोका जाता, बल्कि चुनिंदा गाड़ियों को ही टारगेट किया जाता है। इससे यह अभियान निष्पक्ष कम और खानापूर्ति ज्यादा नजर आता है।

सवाल यह भी है कि यदि सड़क सुरक्षा ही उद्देश्य है, तो कार्रवाई समान और पारदर्शी क्यों नहीं है?

रिकॉर्ड चालान, लेकिन भरोसा कम


आंकड़े भले ही रिकॉर्ड कार्रवाई दिखा रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत में लोगों का भरोसा कमजोर होता दिख रहा है। बिना स्पष्ट प्रक्रिया, बिना समान नियम और बिना पारदर्शिता के यह अभियान लोगों के लिए परेशानी बनता जा रहा है।

नियम क्या कहते हैं?

  • ब्रेथलाइज़र टेस्ट ड्रिंक एंड ड्राइव का प्राथमिक साक्ष्य है
  • 30mg/100ml से अधिक अल्कोहल होने पर ही अपराध माना जाता है।
  • रायपुर में ट्रैफिक पुलिस की कार्रवाई अब “सुरक्षा अभियान” से ज्यादा “वसूली अभियान” के आरोपों में घिरती नजर आ रही है। आम आदमी पर सख्ती और माननीयों को राहत, साथ ही ड्रिंक एंड ड्राइव में कथित शॉर्टकट—इन सबने पूरे सिस्टम की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
  • टेस्ट से इनकार या विशेष स्थिति में ही मेडिकल जांच जरूरी होती है।
  • केवल गंध के आधार पर कार्रवाई कानूनी रूप से कमजोर मानी जाती है।
  • नियम सभी—सरकारी और निजी—वाहनों पर समान रूप से लागू होते हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या नियम सच में सबके लिए बराबर हैं, या फिर सड़क पर भी ‘दो तरह के कानून’ चल रहे हैं?

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